सुबह के करीब आठ बजे बनारस की गलियाँ धीरे-धीरे भरने लगी थीं।
दुकानों के शटर उठ रहे थे। कहीं चाय बन रही थी, कहीं कचौड़ी तलने की खुशबू आ रही थी। मंदिर की घंटियाँ बीच-बीच में सुनाई दे रही थीं।
गली इतनी संकरी थी कि एक तरफ से बाइक आती तो दूसरी तरफ खड़े लोगों को थोड़ा पीछे हटना पड़ता।
राहुल पहली बार बनारस आया था।
वह धीरे-धीरे चल रहा था। कभी किसी दुकान को देखता, कभी ऊपर पुरानी इमारतों को।
एक जगह रुककर उसने ऊपर देखा।
दोनों तरफ की पुरानी इमारतों के बीच आसमान का एक छोटा-सा टुकड़ा दिखाई दे रहा था।
“कितना सुंदर है…”
उसने अपने आप से कहा।
उसने फोन निकाला और तस्वीर ले ली।
थोड़ा आगे गया तो एक छोटी-सी चाय की दुकान दिखी। बाहर चार लोग बैठे थे। एक आदमी चाय डाल रहा था और पास में ही एक बूढ़ा व्यक्ति अखबार पढ़ रहा था।
राहुल वहीं रुक गया।
“भैया, एक चाय देना।”
चाय पीते हुए वह आसपास देखता रहा।
उसे हर चीज़ में कुछ अच्छा लग रहा था।
गली की आवाज़ें।
पुरानी दीवारें।
दुकानों के छोटे-छोटे बोर्ड।
लोगों की आवाजाही।
उसे लग रहा था कि बनारस की यही छोटी-छोटी चीजें इसे अलग बनाती हैं।
उसी समय, उसी गली में एक और आदमी तेजी से चल रहा था।
उसका नाम था महेश।
कंधे पर बैग था और हाथ में फोन।
वह बार-बार फोन की स्क्रीन देख रहा था।
“पहले शर्मा जी की दुकान… फिर गुप्ता जी… उसके बाद चौक वाली दुकान।”
उसने आज के दुकानों की लिस्ट फिर से देखी।
कल उसका टारगेट पूरा नहीं हुआ था।
मैनेजर ने साफ कहा था—
“महेश, इस महीने नंबर अच्छे नहीं हैं। इस हफ्ते संभालना पड़ेगा।”
वह चलते-चलते एक दुकान के सामने रुक गया।
शटर अभी आधा खुला था।
उसने घड़ी देखी।
8:47.
“इतनी देर हो गई…”
वह दुकान के बाहर खड़ा होकर इंतजार करने लगा।
सामने वही गली थी।
राहुल कुछ दूर खड़ा एक पुराने दरवाजे की तस्वीर ले रहा था।
महेश की नजर उस पर पड़ी।
फिर उसने अपनी घड़ी देखी।
“नौ बज गए तो ये दुकान वाला किसी और काम में लग जाएगा।”
वह फिर दुकान की तरफ देखने लगा।
कुछ देर बाद दुकान खुली।
महेश अंदर गया।
“नमस्ते भैया।”
“हाँ, बोलिए।”
महेश ने अपना बैग खोला और सामान दिखाने लगा।
दुकानदार ने कुछ सामान देखा।
“पिछली बार वाला अभी पूरा नहीं निकला।”
महेश ने समझाने की कोशिश की।
“इस बार थोड़ा कम रख लीजिए।”
“नहीं, अभी जरूरत नहीं है।”
महेश ने एक बार फिर कोशिश की।
“भैया, दो पेटी ही रख लीजिए।”
दुकानदार ने सिर हिला दिया।
“अभी नहीं।”
महेश ने सामान वापस बैग में रखा।
“ठीक है। अगले हफ्ते आता हूँ।”
वह बाहर निकल आया।
उसने फोन देखा।
मैनेजर का मैसेज था।
“Order?”
महेश ने कुछ देर स्क्रीन देखी।
फिर सिर्फ़ इतना लिखा—
“Not yet.”
दोपहर तक राहुल कई गलियों में घूम चुका था।
कहीं एक बच्चा पतंग उड़ा रहा था।
कहीं कोई फूल बेच रहा था।
कहीं से भजन की आवाज़ आ रही थी।
एक गली में चलते हुए उसे अचानक सामने से गाय आती दिखाई दी।
वह दीवार से लगकर खड़ा हो गया।
गाय आराम से उसके पास से निकल गई।
राहुल हँस पड़ा।
“ये भी बनारस का हिस्सा है।”
उसने फिर फोन निकाल लिया।
उसी समय महेश भी उसी गली में आ गया।
लेकिन उसके लिए गाय मजेदार नहीं थी।
उसने रास्ता देखा और बुदबुदाया—
“अब ये भी बीच में…”
वह दूसरी तरफ से निकल गया।
राहुल ने उसे जाते हुए देखा।
उसे लगा शायद वह आदमी बहुत जल्दी में है।
शाम होने लगी थी।
राहुल गंगा के किनारे पहुँच गया।
सूरज धीरे-धीरे नीचे जा रहा था।
पानी पर सुनहरी रोशनी फैल गई थी।
नावें धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं।
घाट पर लोग बैठे थे।
कुछ पूजा कर रहे थे।
कुछ बातें कर रहे थे।
कुछ बस चुपचाप गंगा को देख रहे थे।
राहुल सीढ़ियों पर बैठ गया।
उसने इस बार फोन नहीं निकाला।
बस सामने देखता रहा।
थोड़ी देर बाद उसने देखा कि महेश भी उसी घाट की तरफ आ रहा है।
कंधे पर वही बैग।
चेहरे पर थकान।
वह सीढ़ियों पर बैठा और जूते उतारने लगा।
राहुल ने पूछा,
“आज का काम हो गया?”
महेश ने उसे पहचान लिया।
“हाँ… बस अब घर जाना है।”
“बनारस अच्छा लगा?”
महेश ने गंगा की तरफ देखा।
“हाँ।”
“घूमे?”
महेश हँस दिया।
“घूमने कहाँ का समय मिला?”
राहुल भी मुस्कुरा दिया।
कुछ देर दोनों चुप बैठे रहे।
सामने सूरज डूब रहा था।
राहुल उस दृश्य को देख रहा था।
महेश अपने फोन पर आज की रिपोर्ट बना रहा था।
कुछ मिनट बाद महेश खड़ा हुआ।
“चलता हूँ।”
“कल फिर आना है?”
महेश ने बैग कंधे पर रखा।
“कल भी… और परसों भी।”
वह चला गया।
राहुल वहीं बैठा रहा।
अगली सुबह फिर वही गली थी।
फिर वही दुकानें।
फिर वही चाय की खुशबू।
फिर वही घंटियों की आवाज़।
राहुल धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था।
और महेश उसी गली में अपनी बाइक खड़ी करके फोन पर किसी से बात कर रहा था।
“हाँ सर, आज कम से कम तीन ऑर्डर निकालने हैं।”
फोन रखते ही उसने सामने देखा।
सूरज की रोशनी गली के बीच से नीचे आ रही थी।
पुरानी दीवार पर पड़ती हुई।
एक बच्चा उसी रोशनी में खड़ा था।
महेश ने शायद पहली बार उसे देखा।
बस दो सेकंड।
फिर फोन बजा।
“हाँ सर…”
वह आगे बढ़ गया।
राहुल पीछे से उसे देखता रहा।
दोनों एक ही गली में थे।
एक के पास कैमरा था।
दूसरे के पास बिक्री का लक्ष्य।
एक को बनारस दिखाई दे रहा था।
दूसरे को आज का नंबर।
बनारस दोनों के सामने था।
बस महेश के पास उसे देखने की फुर्सत नहीं थी।